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Structure of an intermediate state during protein unfolding

Cover art (Designed by Anupam Patra) featured on 21st Jan 2020 issue of Biophysical Journal (Left). Dr. Harshesh Bhatt and Dr. Akshay Kumar Ganguly (Right)

Proteins are the unique molecules; they read the code of life in genes and their own codes are also hidden in genes.  Therefore, they are called architect, pillars and workhorses of life.  A vast majority of proteins requires a well-defined three-dimensional shape and flexibility for their specific and regulated function inside the cell. Hierarchy of protein structure starts with primary structure consisting of individual amino acid residues, which then organizes itself into helices or sheets to form secondary structures. The great Prof. G. N. Ramachandran was the first to codify geometry of the secondary structural elements in the form of backbone torsion angles. The iconic plot is called Ramachandran Plot. Proteins further fold these secondary structural elements into tertiary and quaternary structures.

Process of formation of these structures, called Protein Folding, starts immediately at their birth place called Ribosomes and most proteins emerge as perfectly folded native structure at the end of their complete synthesis. However, there are few which require helper protein molecules called chaperone to correctly shape them. Different kinds of protein have different lifespan and at the end of it they are degraded to individual units with the help of another set of protein molecules, the process called Protein Unfolding. Both folding and unfolding processes are very specific, rapid and follows a well-defined path. Levinthal Paradox described by Prof. Cyrus Levinthal concluded that had it been a random search process among all possible conformation it would take astronomical age to fold a protein. Any aberration in folding-unfolding processes leads to dysregulation and sometimes formation of aggregated state, resulting in disease conditions such as Alzheimer and Parkinson disease.

Prof. Christian B. Anfinsen had used ribonuclease A as a model showed that primary sequence of the protein under a particular environmental conditions (temperature, solvent concentration and composition, etc.) at which folding occurs, dictates formation of native structure, which is a unique, stable and kinetically accessible minimum of the free energy. Several studies have demonstrated that proteins unfold under different physical and chemical conditions in a test tube and refold back to their native confirmation upon removal of such conditions. This helped the experimentalists to follow folding-unfolding pathways at a high spatial and time resolution and understand mechanisms. Landscape funnel model of protein folding is currently widely accepted model that describes a protein’s journey through the crests and troughs of internal free energy and degrees of freedom to reach the folded state from rapidly exchanging ensemble. Proteins also take a trek through the funnel during their unfolding.

The key to understanding protein (un)folding mechanism, which is still a challenge, is high-resolution structural characterisation of all states along the funnel. In this regards solution-state NMR spectroscopy is unparalleled in providing atomic-resolution structural and dynamics information of all the states, folded, unfolded and intermediates including invisibles, along the funnel. In this work we have used a canonical RNA recognition motif (RRM) from ETR3 protein (involved in muscular dystrophy disease) to understand the unfolding mechanism of RRM containing protein. This is important as a similar motif in TDP-43 protein aggregated and eventually leads to neuromuscular disease conditions due to formation of non-native structural elements. We determined the atomic-resolution structure and dynamics of folded native state (at bottom of the funnel) and an unfolding intermediate at the middle of the funnel and performed structural and dynamics characterisation of the unfolded ensemble rapidly dancing the top of the funnel. Our data indicates that intermediate state has folded like structure but swollen and dynamics. It allows solvent to access its core more easily than the folded structure. The edges of secondary structural elements are the initiation sites of unfolding. Although the unfolded state is very dynamic and lacks any structural elements still it show bias for certain structural propensities which appears like keeping a memory of their folded state.

We believe that the atomic-resolution characterisation of unfolding pathway of a canonical RNA recognition motif is likely to help in understanding the unfolding events in other RRMs involved in disease causing conditions upon misfolding.

The study might also help in understanding those systems where protein is refolded from the purified inclusion bodies. In those cases there could be presence of minor population of folded-like but not fully folded native structure.

The work was primarily done by Dr. Harshesh Bhatt and Dr. Akshay Kumar Ganguly and FCS work was performed in collaboration with Dr. Sobhan Sen, School of Physical Sciences, Jawaharlal Nehru University (JNU), New Delhi. The cover art was designed by Mr. Anupam Patra, Ph.D. student.

प्रोटीन अद्वितीय अणु हैं; वे जीन में जीवन का कोड पढ़ते हैं और उनके स्वयं के कोड भी जीन में छिपे होते हैं। इसलिए, उन्हें जीवन के वास्तुकार, स्तंभ और कार्यक्षेत्र कहा जाता है। अधिकतर प्रोटीन को कोशिका के अंदर उनके विशिष्ट और विनियमित कार्य के लिए एक त्रिआयामी संरचना और लचीलेपन की आवश्यकता होती है। प्रोटीन संरचना का पदानुक्रम प्राथमिक संरचना से शुरू होता है जिसमें अमीनो एसिड के अवशेष होते हैं, जो तब द्वितीयक संरचनाओं के निर्माण के लिए हेलिकॉप्टर या शीट में व्यवस्थित होते हैं। महान वैज्ञानिक  प्रो. जी. एन. रामचंद्रन ने प्रोटीन की पृष्ठ के द्वितल कोणों के माध्यम से संरचनात्मक तत्वों की ज्यामिति को संहिताबद्ध करने का कार्य किया था। इन कोणों के ऊपर उनके द्वारा बनाया गया द्वि-आयामी ज्यामिति क्षेत्र को ‘रामचंद्रन प्लॉट कहा जाता है। प्रोटीन इन द्वितीयक संरचनाों को तृतीयक और चतुर्धातुक संरचनाओं में बदल कर मूल संरचना का निर्माण करते हैं।

इन संरचनाओं के निर्माण की प्रक्रिया, जिसे प्रोटीन फोल्डिंग  कहा जाता है, उनके जन्म स्थान पर शुरू होती है जिसे राइबोजोम कहा जाता है और अधिकांश प्रोटीन अपने पूर्ण संश्लेषण के अंत में पूरी तरह से आकृत हो मूल संरचना के रूप में उभरते हैं। हालांकि, कुछ ऐसे हैं जिन्हें जिन्हें सही ढंग से आकार पाने के लिए सहायक प्रोटीन अणुओं की आवश्यकता होती है, जिन्हे चैपरोन कहा जाता है। विभिन्न प्रकार के प्रोटीन का अलग-अलग जीवन काल होता है और इसके अंत में इन्हे एक अलग प्रकार के प्रोटीन अणुओं की आवश्यकता होती है जो उन्हें व्यक्तिगत इकाइयों अलग-अलग कर देता है, इस प्रक्रिया को प्रोटीन अनफोल्डिंग कहते है। फोल्डिंग और अनफोल्डिंग दोनों प्रक्रियाएं बहुत विशिष्ट, तीव्र और एक परिभाषित पथ का अनुसरण करती हैं। प्रो. साइरस लेविंथल द्वारा वर्णित लेविथल पैराडॉक्स के अनुसार अगर प्रोटीन अपने हर एक संभावित आकृति को समन्वेषित कर अपनी सही आकृति को प्राप्त करने की चेष्टा करे तो इस प्रक्रिया को खगोलीय उम्र लग जाएगी। फोल्डिंग-अनफोल्डिंग प्रक्रियाओं में किसी भी तरह की गड़बड़ी से विकृति उत्पन्न हो जाती है और कभी-कभी इस स्थिति में प्रोटीन का ढेर बनकर द्रव से आ जाते हैं और कोशिकाओं में जम जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अल्जाइमर और पार्किंसंस रोग जैसे रोग होते हैं।

प्रो. क्रिश्चियन बी. अनफिंसन ने राइबोन्यूक्लिज़ ए प्रोटीन पर प्रयोग करके ये दिखाया था कि एक विशेष पर्यावरणीय परिस्थितियों (तापमान, विलायक एकाग्रता और संरचना, आदि) के तहत प्रोटीन का प्राथमिक अनुक्रम जिस पर तह होती है, मूल संरचना के गठन को निर्धारित करता है, जो एक अद्वितीय, स्थिर और बलगति रूप से सुलभ न्यूनतम ऊर्जा वाली स्थिति  है। कई अध्ययनों से पता चला है कि एक टेस्ट ट्यूब में विभिन्न भौतिक और रासायनिक स्थितियों में प्रोटीन की अपनी संरचना खुल जाती है और ऐसी स्थितियों को हटाने पर वह अपनी मूल पुष्टि को वापस प्राप्त कर लेता है। इससे प्रायोगिकों को एक उच्च स्थानिक और समय प्रमाणिकता पर फोल्ड-अनफोल्डिंग मार्ग और उसके तंत्र को समझने में मदद मिलती है। प्रोटीन फोल्डिंग का परिदृश्य कीप (लैंडस्केप फ़नल) तंत्र वर्तमान में व्यापक रूप से स्वीकृत तंत्र है, जो तीव्र मुक्त ऊर्जा से मुग्ध अवस्था में पहुँचने के लिए आंतरिक मुक्त ऊर्जा और स्वतंत्रता-श्रेणी के शिखाओं और गर्तों के माध्यम से प्रोटीन की यात्रा का वर्णन करता है। प्रोटीन अपने संरचना खुलने के दौरान कीप के माध्यम से ही यात्रा करते हैं।

प्रोटीन की संरचना के बनने और खुलने के तंत्र को समझने की कुंजी, जो अभी भी एक चुनौती है, कीप के भीतर के सभी संरचनाओं के उच्च-स्तर पे संरचनात्मक वर्णन अत्यावश्यक है। इस संबंध में एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी सभी आकृतियों के परमाणु-स्तर की संरचनात्मक और गतिशीलता की जानकारी प्रदान करने में अद्वितीय है, और साथ ही अदृश्य, अनफोल्डेड और मध्यवर्ती सहित सभी आकृतियों की जानकारी प्रदान करता है। इस काम में हमने आर. आर. एम. युक्त प्रोटीन के अनफोलोइंग तंत्र को समझने के लिए ई. टी. आर.-३ (ETR-3) प्रोटीन (मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रोग से जुड़ा) से एक विहित आर.एन.ए. रिकग्निशन मोटिफ (RRM) का उपयोग किया है। यह टी.डी.पी.-४३ प्रोटीन में पाए जाने वाले एक समान रूपांकनों के रूप के कारण महत्वपूर्ण है और जिसमे गैर-मूल संरचनात्मक तत्वों के गठन के कारण स्नायु-पेशी (न्यूरोमस्कुलर) रोग उत्पन्न होता है। हमने ई. टी. आर.-३ प्रोटीन के आर. आर. एम.-३ की मूल स्थिति (कीप के नीचे) और कीप के मध्य में की एक थोड़ी खुली हुई स्थिति की परमाणु-स्तर पर संरचना और गतिशीलता निर्धारित की और कीप के शीर्ष पर उन्मुक्त नृत्य करते हुए पूर्णतः खुले हुए आकृति समूह की संरचनात्मक और गतिकी की जानकारी प्राप्त की। हमारे द्वारा प्राप्त तथ्य ये बताता है कि मध्यवर्ती आकृति अपने मूल संरचना की तरह है लेकिन उसमे सूजन और अधिक गतिशीलता है। इस संरचना के अन्दर द्रव (पानी) को मूल संरचना की तुलना में अधिक आसानी से जा पाते हैं। माध्यमिक आकृति के संरचनात्मक तत्वों के किनारे प्रोटीन के खुलने के आरम्भिक स्थल हैं। हालांकि पूर्णतः खुले हुआ आकृति समूह बहुत ही गतिशील है और उसमे किसी भी संरचनात्मक तत्वों की कमी है, फिर भी यह कुछ विशेष संरचनात्मक स्थितिओं के लिए पूर्वाग्रह दिखाती है, जो उनके मूल संरचना की स्मृति रखने जैसा प्रतीत होता है।

हम मानते हैं कि हमारे द्वारा वर्णित परमाणु-स्तर की जानकारी से विभिन्न रोगों में शामिल अन्य आर. आर. एम. के संरचना खुलने की घटनाओं को समझने में मदद मिलेगी |

यह अध्ययन उन प्रणालियों को समझने में भी मदद कर सकता है जहां प्रोटीन थक्केदार अवस्था से वापस मूल संरचना में लाया जाता है। इन मामलों में मूल संरचना जैसी मामूली आबादी की भी मौजूदगी हो सकती है, जो पूरी तरह से मूल संरचना में ना हों।

यह शोध मुख्यतः डा. हर्षेश भट्ट और डा. अक्षय कुमार गांगुली द्वारा किया गया और FCS कार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे. एन. यू. )के भौतिक विज्ञान के डा. सोभन सेन के सहभागिता से की गई | मुख्य पृष्ठ आवरण को श्री अनुपम पात्रा, वर्तमान पी.एच.डी. छात्र, ने बनाया है।

References

  1. Dill K.A. and Chan H.S. (1997) From Levinthal to pathways to funnels. Nat. Struct. Biol. 4: 10-19
  2. Bhatt H, Ganguly AK, Sharma S, Kushwaha GS, Khan MF, Sen S and Bhavesh NS (2020) Structure of an unfolding intermediate of an RRM domain of ETR-3 reveals its native-like fold. Biophys. J. 118, 352-365.
  3. Structure co-ordinates: Protein Data Bank (PDB) accession numbers 2MY7 and 2MY8. Sequence-specific resonance assignments: BioMagResBank (BMRB) IDs: 19316 and 19685.

First report of molecular mechanism of RNA recognition in Malaria parasite

 

Structure of the PfSR1-RNA complex. Dr. Akshay Kumar Ganguly and Ms. Garima Verma who did the work.

Among the vector borne diseases malaria affects the maximum population. In 2017 alone there were about 22 crore cases more than 4 lakh death worldwide with India accounting for 6% of them1. Malaria is caused in humans when a female Anopheles mosquito transfer protozoan parasites of the genus Plasmodium and Plasmodium falciparum is the most lethal of the malarial parasites. The economic consequence of this widespread disease is also apparent from the fact that malaria endemic countries have much lower GDP growth than countries free from malaria2. In recent years drug resistance in malaria has emerged as a major threat to the public health. It is thus, imperative to elucidate the ways in which this parasite thrives in its hosts as well as the various mechanisms it employs to sustain an infection, in order to be able to effectively combat this menace. Malaria parasite uses an intelligent mechanism called alternate splicing to generate protein diversity. Alternate Splicing is one of the evolved mechanisms in higher organisms to produce different protein from a single gene by differentially processing the transcribed mRNA. This gives the parasite an added advantage to evade the drugs. To understand this important cellular event in malaria parasite we delineated the molecular mechanism of RNA binding of one such protein called serine/arginine rich (SR) protein of P. falciparum (PfSR1)5, which is the first such study in apicomplexans. Using Nuclear Magnetic Resonance (NMR) spectroscopy we determined atomic-resolution solution structures of PfSR1 protein6 in free and RNA bound states.

Supported by thermodynamic quantification we found that RNA binding domains of PfSR1 protein have contrasting preference for RNA while first domain has preference for pyrimidine especially 5’cytosine, other prefers purines (A or G), possibly due to different charges of the surface of both domains.

Our work opens a new window to understand how malaria parasite is able to produce 20% more proteins from its 5700 genes3-4 which makes it more complex than many of the organisms having more genes than it and easy to evolve into drug resistant one.

The work was primarily done by Dr. Akshay Kumar Ganguly and was actively supported by Ms. Garima Verma.

वेक्टर जनित बिमारियों में मलेरिया अधिकतम आबादी को प्रभावित करता है। अकेले २०१७ में दुनिया भर में लगभग २२ करोड़ लोग मलेरिया से ग्रसित हुए और ४ लाख से अधिक मौत के शिकार हुए जिनमे लगभग ६% भारतीय थे । मनुष्यों में मलेरिया मादा एनोफेल्स मच्छर के काटने से होता है जिसमे प्रोटोज़ोन परजीवी प्लाज्मोडियम मच्छर से निकल कर रक्त धमनियों में आ जाती है|  प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम मलेरिया परजीवियों में सबसे घातक है | इस व्यापक बीमारी का आर्थिक दुष्प्रभाव इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि मलेरिया प्रभावित देशों की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि की दर मलेरिया मुक्त देशों की तुलना में बहुत कम है। विगत वर्षों में मलेरिया में दवा प्रतिरोध सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। इस खतरे से निपटने में सक्षम होने के लिए हमे यह समझना बहुत ही जरुरी है यह परजीवी को अपने मेजबानों के भीतर संक्रमण को बनाए रखने के लिए किन विभिन्न युक्तियों का प्रयोग करता है और किस प्रकार करता है | मलेरिया परजीवी अपने भीतर प्रोटीन विविधता उत्पन्न करने के लिए ‘वैकल्पिक विभाजन’ नामक एक बुद्धिमान प्रक्रिया का उपयोग करता है | वैकल्पिक विभाजन विकसित जीवों में पाया जाने वाला यह वह विधि है जिसमे जीन से उत्पन्न वाहक आर.एन.ए. को अलग-अलग तरीके से प्रसंस्करित करके एक ही जीन से अलग-अलग प्रोटीन का उत्पादन करने के लिए जाता है । यह परजीवी को दवाओं से बचने के लिए एक अतिरिक्त लाभ देता है।मलेरिया परजीवी में इस महत्वपूर्ण कोशिकीय घटना को समझने के लिए हमने पी. फाल्सीपेरम के एक सेरीन/आर्जिनिन समृद्ध (एस.आर.) प्रोटीन (पी.एफ.एस.आर.१) द्वारा आर.एन.ए. के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के तरीके का आणविक स्तर पर अध्ययन किया, जो कि एपीकंपप्लेक्सन समुदाय के किसी भी जीव में पहला अध्ययन है| इसके लिए हमने परमाणु चुंबकीय अनुनाद (एन.एम.आर.) स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग करके पी.एफ.एस.आर.१ प्रोटीन की अकेले और आर.एन.ए के साथ जुड़े स्थितियों में आणविक संरचना का पता लगाया |

आणविक संरचना और ऊष्मागतिकी परिमाणन से हमने ये पाया कि पी.एफ.एस.आर.१ प्रोटीन के दोनों घटक अलग अलग प्रकार के आर.एन.ए. के साथ सम्बंध  स्थापित करते हैं, जहाँ पहल घातक पिरिमिडीन, विशेष रूप से ५’ साइटोसाइन, वाले आर.एन.ए. के लिए वरीयता रखता है वहीँ दूसरा घटक प्यूरीन्स (ए या जी) वाले आर.एन.ए. को पसंद करता है | शायद ऐसा उनके भिन्न आवेश युक्त सतह के काऱण है | हमारे इस काम से भविष्य में ऐसे शोध में तेज़ी आएगी जिससे ये पता चल सकेगा कि कैसे मलेरिया परजीवी अपने ५७०० जीन से २० % से अधिक प्रोटीन उत्पन्न करने में कैसे सक्षम है जो मलेरिया परजीवी को अपने से अधिक जीन वाले जीवों से अधिक जटिल बनाता है और इसे दवा प्रतिरोधी में विकसित होने में सहायता प्रदान करता है|

यह शोध मुख्यतः डा. अक्षय कुमार गांगुली द्वारा किया गया और गरिमा वर्मा ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया |

References

  1. World Malaria Report 2018 (https://www.who.int/malaria/publications/world-malaria-report-2018/en/)
  2. Gallup JL and Sachs JD. (2001).The economic burden of malaria. Am J Trop Med Hyg 64, 85-96
  3. Gardner MJ, Hall N, Fung E, White O, Berriman M, Hyman RW, et al. (2002). Genome sequence of the human malaria parasite Plasmodium falciparum, Nature. 419 498-511.
  4. Sorber K, Dimon MT and DeRisi JL. (2011) RNA-Seq analysis of splicing in Plasmodium falciparum uncovers new splice junctions, alternative splicing and splicing of antisense transcripts. Nucleic Acids Res 39, 3820-3835.
  5. Eshar S, Allemand E, Sebag A, Glaser F, Muchardt C, Mandel-Gutfreund Y, et al. (2012). A novel Plasmodium falciparum SR protein is an alternative splicing factor required for the parasites’ proliferation in human erythrocytes, Nucleic Acids Res 40, 9903-9916.
  6. Ganguly AK, Verma G and Bhavesh NS(2019) The N-terminal RNA recognition motif of PfSR1 confers semi-specificity for pyrimidines during RNA recognition.  J. Mol. Biol. 431, 498-510
  7. Structure co-ordinates: Protein Data Bank (PDB) accession numbers 2N3L and 2N7C. Sequence-specific resonance assignments BioMagResBank (BMRB) IDs: 25650, 25800, 25779.

जीव-विज्ञान शोध में नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद वर्णक्रममापी (एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी) की भूमिका

अनेकसंशयोच्छेदि, परोक्षार्थस्य दर्शकम्।

सर्वस्य लोचनं शास्त्रं, यस्य नास्ति अन्धैव सः॥

(अनेक संशयो को दूर भगाता है, जो सर्वविदित नहीं है उसका दर्शन कराता है,

विज्ञान सभी के लिए आँख है और जिसके पास ये नहीं है वो अँधा है | )

पदार्थ एवं उसके अंगभूत तत्वों और प्रकाश के बीच होने वाले रोचक परस्पर क्रियाओं के कारण ही हमारा ब्रह्माण्ड एक मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है, परन्तु हमारी चक्षुओं की सीमाएँ हमें प्रकाश की केवल एक छोटा सा हिस्सा देखने की अनुमति देती हैं, जिसे हम दृश्यमान भाग कहते हैं और ये दृश्यमान भाग, एक्स-रे, माइक्रोवेव, रेडियोवेव इत्यादि को सम्मिलित कर एक बड़े परिवार का हिस्सा है जिसे विद्युत चुम्बकीय वर्णक्रम (इलेक्ट्रो मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम)  कहा जाता है। यह वर्णक्रम एक इंद्रधनुष के समान है जिसमे अनंत रंगो का समावेश है और जिसका रहस्योघाटन हम प्रत्यक्ष रूप से अपने नयनों द्वारा नहीं कर सकते हैं। पदार्थ एवं उसके अंगभूत तत्व किस प्रकार विद्युत चुम्बकीय वर्णक्रम के साथ सम्बन्ध स्थापित करते हैं यही वर्णक्रममापी (स्पेक्ट्रोस्कोपी) के मूल सिद्धांतों का आधार है। ब्रह्माण्ड का विस्तार किस रफ़्तार से हो रहा है या हमारे शरीर को बनाने वाली अविश्वसनीय रूप से छोटे अणु और परमाणु कैसे दी iखते हैं जैसे आधुनिक विज्ञान की हर प्रगति में, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, स्पेक्ट्रोस्कोपी की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। इस परिप्रेक्ष्य में हमे ये विदित हैं कि हमारी त्वचा के एक सूक्ष्म टुकड़े में हज़ारों कोशिकाएँ होती हैं जिनमे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, न्यूक्लिक एसिड के लाखों अणु होते हैं। ये ‘जैविक अणुओं’ अथवा उपापचय की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण प्रतिफल एक संघटित रूप में छह मूल तत्वों; कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, फास्फोरस और सल्फर से बने होते हैं।

नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद वर्णक्रममापी या एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी एक अत्याधुनिक तकनीक है जिसका प्रयोग कोशिकाओं के भीतर चल रही जटिल क्रियाओं के अध्ययन करने के लिए किया जाता है। एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी का आरंभिक विकास ४० के दशक में परमाणुओं के चुंबकीय गुणों में जानकारी हासिल करने के लिए भौतिक शास्त्रियों द्वारा किया गया था। तत्पश्चात एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी बहुत तेजी से विकसित होकर भौतिकविदों, रसायनशास्त्रियों, भूवैज्ञानिकों, जीववैज्ञानिकों, और चिकित्सकों के लिए एक अनिवार्य तकनीक बन गयी।

NMR

एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी के क्षेत्र में आयी तकनीकी प्रगति, इसके महत्वकारी उपयोग और सर्वव्यापी प्रकृति की पुष्टि इस बात से होती है कि भौतिकी, रसायन विज्ञान और शरीर-विज्ञान/चिकित्सा के क्षेत्र एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी के प्रयोग करने वाले बारह वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है।  हाल के वर्षों में, एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी ने अनेकों महत्वपूर्ण एवं जटिल अनुसंधानों में अभूतपूर्व सफलताएँ हासिल की हैं जो पहले काफी दुष्कर सिद्ध हुईं थी जैसे की एक जीवित कोशिका के अंदर प्रोटीन की परमाणु संकल्प संरचना बताना, मस्तिष्क का कार्यात्मक छायांकन, जैव-द्रव पदार्थ (मूत्र, रक्तोद, लार आदि का उपयोग करते हुए) में बीमारी के जैव-चिन्हों (बायोमार्कर) की पहचान, तेल की खोज, विस्फोटकों का पता लगाने, शराब की गुणवत्ता नियंत्रण इत्यादि कुछ उदहारण हैं।

Untitledएन.एम.आर स्पेक्ट्रोस्कोपी परमाणु नाभिकों का उपयोग करता है जो यूँ तो अनियमित तरीके से चक्रण (स्पिन) करते हैं परन्तु अति-प्रचण्ड चुंबकीय क्षेत्र (पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से लाख गुना अधिक शक्तिशाली !) की उपस्थिति में खुद को नियमित कर एक ही दिशा में निरपेक्षित हो जाते हैं।

इन चुम्बकीय परमाणुओं को अतितीव्र रेडियो तरंगों (मोबाइल संचार में इस्तेमाल होने वाली किरणों के समान) से विकिरणित किया जाता है और उनके बीच हो रही परस्पर प्रतिक्रिया को मापा जाता है। इस प्रतिक्रिया के माप से परमाणु नाभिकों को आस-पास के वातावरण किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं उसका पता चलता है। उधारणतः एक कार्बन नाभिक अगर ऑक्सीजन से अथवा हाइड्रोजन से जुड़ा हो तो वो दोनों स्थितियों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया प्रदर्शित करेगा। परमाणु वातावरण में आये हर परिवर्तन के कारण विशेष एन.एम.आर संकेत प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार प्रत्येक एफ.एम. रेडियो स्टेशन की अपनी आवृत्ति पट्ट होती है (जैसे की ९८.३  मेगाहर्ट्ज़, ९३.५ मेगाहर्ट्ज इत्यादि) उसी प्रकार विभिन्न परमाणु नाभिकों की अपनी अनूठी रेडियो आवृत्ति होती है जिसे “अनुनाद आवृत्ति” (रेजोनेंस फ्रीक्वेंसी)  कहते हैं। पृथ्वी की चुंबकीय क्षेत्र (०.२५-०.६५ माईक्रो टेसला) से लगभग २ करोड़ गुना अधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (११.७४ टेसला) में हाइड्रोजन परमाणु की अनुनाद आवृत्ति ५०० मेगाहर्ट्ज होती है जबकि कार्बन-१३ (कार्बन का एक समस्थानिक (आइसोटोप)) १२५ मेगाहर्ट्ज और नाइट्रोजन-१५ ५० मेगाहर्ट्ज पर अनुनादित होता है।

1stNMRspectraबाहरी प्रभावों की उपस्थिति में अनुनाद आवृत्ति में परिवर्तन आता है जिनका माप मेगाहर्ट्ज (१,०००००० हर्ट्ज) में न होकर अपितु हर्ट्ज में होता हैं। ये अति सूक्ष्म परिवर्तन भी माप योग्य है। आवृत्ति में आए इन छोटे परिवर्तन को ‘केमिकल शिफ्ट’ कहते है जिसके खोज सर्वप्रथम प्रो. एस. एस. धर्मात्ती ने की (प्रो. धर्मात्ती ने बाद में भारत में सबसे पहले टी.आई.एफ.आर., बम्बई में एन.एम.आर. अनुसंधान प्रारंभ किया)।

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जब तक एक परमाणु का वातावरण स्थिर बना रहता है तब तक उसका केमिकल शिफ्ट भी अपरिवर्तित रहता है। वातावरण में आया एक मामूली सा विचलन भी केमिकल शिफ्ट में परिवर्तन लाने के लिए पर्याप्त है। परमाणु नाभिक अलग वातावरण में रेडियो आवृति स्पंद (पल्स) के साथ अलग प्रतिक्रिया देते हैं और वे अपने पड़ोसी परमाणु नाभिकों के साथ परस्पर संवाद करने लगते हैंEtOH-NMR। निकटवर्ती परमाणुओं के बीच हो रहे परस्पर संवाद और उससे उत्पन्न एन.एम.आर संकेतों से अणुओं जैसे कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, न्यूक्लिक एसिड के त्रि-आयामी संरचना का पता चलता है। त्रि-आयामी संरचना बताने वाली इस तकनीक को नाभिकीय ओवरहाउसेर वृद्धित स्पेक्ट्रोस्कोपी या नोइज़ी (NOESY) कहते हैं जिसका सर्वप्रथम मापन प्रो. अनिल कुमार द्वारा किया गया था जो वर्तमान में आई.आई.एससी., बंगलौर में कार्यरत हैं। इस विकास ने न ही वैज्ञानिकों को सिर्फ कोशिकाओं के अंदर उनके प्राकृतिक वातावरण में अणुओं के परमाणु संकल्प त्रि-आयामी संरचना का पता लगाने में मदद की अपितु उन अणुओं के भीतर गतिकी और अन्य अणुओं के साथ संबंधों का अध्ययन करने में भी सहायता प्रदान की है। यूँ तो एन.एम.आर स्पेक्ट्रोस्कोपी अपने बड़े भाई एक्स-रे स्फटिक विधा (क्रिस्टलोग्राफी) से लगभग आधी सदी छोटी है फिर भी प्रोटीन डाटा बैंक (पी.डी.बी., http://www.rcsb.org) में जमा न्यूक्लिक एसिड संरचनाओं में इसका योगदान ४०% और प्रोटीन संरचनाओं में १२% है। २००९ में पहली बार किसी जीवित कोशिका के भीतर एक प्रोटीन की आणविक संरचना का पता एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी के द्वारा लगाया गया।  आज भी एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी एकमात्र ऐसी तकनीक है जिससे जीवित कोशिका के अंदर प्रोटीन अथवा नुक्लिक एसिड के आणविक संरचना का पता लगाया जा सकता है।

आप ये सोच सकते हैं कि ठोस स्तर में इसका क्या उपयोग हो सकता है। एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी ये बता सकती है कि एक विशेष प्रोटीन मलेरिया रोधी या तपेदिक दवा के लिए एक संभावित चिकित्सीय लक्ष्य हो सकता है या नहीं, रक्त में कार्बोहाइड्रेट का असामान्य स्तर एक संभावित खतरनाक ट्यूमर की मौजूदगी के निशान हैं या नहीं अथवा न समझने में आने वाली रोग्यावस्था में शरीर के भीतर के हज़ारों प्रोटीन में से कौन अपनी सही भूमिका प्रदर्शित नहीं कर रहा है। एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी ऐसे यौगिकों के प्रारूप बनाने या फिर उनके अनुवीक्षण करने में अपरिहार्य भूमिका निभाता है। इसके अलावा, कई दवाओं की कार्रवाई के तरीके के खोज में भी एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी अत्यंत उपयोगी साबित हुआ है। उदाहरण के लिए, २०१० में सिंगापुर में वैज्ञानिकों ने ये पता लगाया कि ‘टैक्रॉलीमस’ या ‘एफ.के. ५०६’ नामक दवा जिसका प्रयोग अंग प्रत्यारोपण के लिए किया जाता है वो मलेरिया के ईलाज के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है क्योंकि वह प्लासमोडियम परजीवी की कोशिका की सतह पर पाये जाने वाले एक ग्रहीता प्रोटीन ‘एफ. के. बी. पी. ३५’ से बाध्यकारी सम्बन्ध बनाकर उसे मारता है। ऐसा प्लासमोडियम के ‘एफ. के. बि. पी. ३५’ प्रोटीन के आणविक संरचना, टैक्रॉलीमस’ के साथ और उसके बगैर की स्थिति की जानकारी के पश्चात ही हुआ। दोनों स्थितियों की आणविक संरचना एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा ही प्राप्त हुई।

दवाओं की खोज में एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी का सबसे अच्छा उपयोग मानव सर्वाईविन प्रोटीन के मामले में है। यह प्रोटीन कैंसर चिकित्सा के लिए एक आकर्षक लक्ष्य है क्योंकि सर्वाईविन प्रोटीन अपने निष्क्रिय रूप में कैंसर की अनश्वर कोशिकाओं को एक प्राकृतिक ढंग से नष्ट करता है। हाल ही में एबट लैबोरेट्रीज ने बहुत सारे पेप्टाइड्स (प्रोटीन के छोटे टुकड़े) की छानबीन की है जिससे उस सर्वश्रेष्ठ पेप्टाइड का पता चल सके जो सर्वाईविन प्रोटीन को पूर्णतः निष्क्रिय बना सके। इसके लिए सबसे पहले एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी के द्वारा सर्वाईविन प्रोटीन की त्रिआयामी संरचना का पता लगाया गया। सर्वाईविन प्रोटीन की संरचना से ये सुराग मिला कि संभावित दवाएं (पेप्टाइड टुकड़े) सर्वाईविन की किस हिस्से पे अपने को आबद्ध कर सकती है। उन बाध्यकारी ठिकानो पे स्थित अमीनो एसिड परिशिष्ट के केमिकल शिफ्ट में तब परिवर्तन आएगा जब वे पेप्टाइडओं से आबद्ध होंगे। आबद्ध न होने की स्थिति में उनके केमिकल शिफ्ट अचल रहेंगे। इस परिक्रिया से सर्वाईविन प्रोटीन से दृढ़ आबद्ध  होने वाले पेप्टाइडओं का अति त्रिवता से चयन करने में मदद मिलती है और वे पेप्टाइड ही संभावित कैंसर रोधी दवाओं के रूप में कार्य कर सकते हैं। इस दृष्टिकोण का प्रयोग हाल के दिनों में कई दवाओं को रूप-रेखा बनाने में इस्तेमाल किया गया है और इस प्रक्रिया को टुकड़ो पे आधारित दवा की खोज या ‘फ्रेगमेंट बेस्ड ड्रग डिस्कवरी’ (एफ. बी. दी. दी.) कहते हैं।

सर्वाईविन प्रोटीन मामला एक दिलचस्प उदहारण है जिसमे यह पता चलता है की जैविक परस्पर क्रिया के मूल अध्ययन से किस प्रकार दवाओं के संभावित आबद्ध प्रणाली की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा प्राप्त सर्वाईविन प्रोटीन की आणविक संरचना से ये पता चला कि अपने कार्यात्मक स्थिति में उसके के दो अणु एक जोड़ी के रूप में मौजूद रहते है और उसकी संरचना एक धनुष और एक टाई के आकार के समान प्रतीत होती है। सामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत सर्वाईविन प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर स्मैक नामक एक पेप्टाइड के साथ आबद्ध होती है। सर्वाईविन प्रोटीन में कौन से अमीनो एसिड परिशिष्ट स्मैक से सम्बन्ध बनाने में विशेष भूमिका निभाते है इसका पता उनके केमिकल शिफ्ट में आने वाले परिवर्तनों का पता लगा के किया जाता है जब वे स्मैक पेप्टाइड से आबद्ध हों। इसके निर्धारण हेतु एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी का ही प्रयोग किया जाता है। इससे हम ये निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिन अमीनो एसिड परिशिष्टों के केमिकल शिफ्ट में अधिक परिवर्तन आता है वो ही सर्वाईविन प्रोटीन के बाध्यकारी सतह का निर्माण करते हैं।

जिस तरह एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी दवाओं की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ है उसी प्रकार हाल के वर्षों में इसने मेटाबोलोमिक्स के क्षेत्र में भी अपना लोहा साबित किया  है। शरीर के भीतर के जैव तरल एवं ठोस पदार्थों (मूत्र, रक्तोद, लार कोशिका, उत्तक आदि) में पाये जाने वाले छोटे-छोटे अणुओं का तेजी से और सही पता लगाने वाली विधा को मेटाबोलोमिक्स कहते हैं। इस तरह के छोटे अणुओं का वजन आमतौर पर एक ही हाइड्रोजन परमाणु (ब्रह्मांड में सबसे छोटी परमाणु) से लगभग १५०० गुना ही होता है ! इसके विपरीत, औसत प्रोटीन हाइड्रोजन की तुलना में लगभग ३०,०००-१००,००० गुना भारी होती है! इसका प्रयोग शारीरिक या रोग उत्तेजनाओं के कारण शरीर में होने वाली गतिशील जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं के मात्रात्मक मापन के लिए किया जाता है। मेटाबोलोमिक्स का इस्तेमाल विविध क्षेत्रों में होता है जैसे कि रोग-तंत्र की जानकारी, रोग निदान / विकृतियों का पता लगाने में, पोषण हस्तक्षेप करने में और दवा विषाक्तता की जाँच में। चयापचयों (मेटाबॉलीटेस) की रूपरेखा की जानकारी रोग प्रगति और दवाओं के हस्तक्षेप के जैव-चिन्हों (बायोमार्करों) की पहचान करने में तेजी से महत्वपूर्ण हो गयी है और ये अतिरिक जानकारी प्रदान करता है जो जीनोमिक और प्रोटिओमिक तथ्यों की व्याख्या या समर्थन करने में सहायता करता है।

मेटाबोलोमिक्स में प्रयोग आने वाले अन्य तकनीकों के मुकाबले एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी ज्यादा सुविधा जनक और लाभकारी है क्योंकि ये एक मात्रात्मक, गैर-विध्वंशकारी, शरीर के साथ न छेड़-छाड़ करने वाली और न संतुलन बिगाड़ने वाली तकनीक है जिससे चयापचयों की आणविक संरचना के बारे में विस्तृत जानकारी का पता उसके भीतर हो रहे अंतर परमाणु सम्बन्धों के कारण चलता है। इसका प्रयोग चयापचयों की आणविक गतिकी और चलिष्णुता (जैसे प्रोटीन और छोटे अणुओं के बन्धन) का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह उच्च श्रेणी की एक मजबूत और विश्वसनीय तकनीक है जिसका अनुप्रयोग मेटाबोलोमिक्स के लिए किया जाता है जहाँ प्रतिकृति का होना अनिवार्य है। इसके प्रयोग से एक साथ संरचनात्मक रूप से विविध चयापचयों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है और एक नियत समय बिंदु पर चयापचय (मेटाबोलाइट) का आशुचित्र प्रदान करता है। मायक्रो-मोलर सांद्रता तक मेटाबोलाइट की पहचान एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा की जा सकती है।  

एक अन्य उदाहरण में २००६ में किए गए एक शोध में एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी के सहयोग से ये दिखाया गया कि अग्न्याशय (इंसुलिन बनाने वाला अंग) के एक प्रकार के कैंसर के रोगियों के रक्त में एक विशेष प्रकार की वसा फोस्फोटिडायल एनोसिटोल सामान्य से काफी कम होती है। इस मेटाबोलोमिक्स अध्ययन के लिए कैंसर रोगियों के रक्त का उपयोग किया गया था। एक सामान्य, स्वस्थ व्यक्ति की तुलना में कैंसर रोगियों के रक्त में फोस्फोटिडायल एनोसिटोल के हाइड्रोजन परमाणुओं के एन.एम.आर. चिन्हों की तीव्रता काफी कम पायी गयी हालांकि उनके केमिकल शिफ्ट में कोई परिवर्तन नहीं दिखा। इस खोज का ये महत्व है कि चिकित्सक-गण उन व्यकितियों के रक्त में फोस्फोटिडायल एनोसिटोल के स्तर की निगरानी रख सकते हैं जो कैंसर उत्पन्न करने वाले रसायनों के साथ काम करते हैं अथवा जिनके परिवार में अग्नाशय के कैंसर का इतिहास रहा है। इसके पहले कि कैंसर एक अधिक खतरनाक स्थिति की ओर अग्रसर हो उसके पहले ही उसकी चिकित्सा तेजी के साथ संभव है। एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी शोध के कारण ही वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में फोस्फोटिडायल एनोसिटोल को अग्नाशय के कैंसर का एक मुख्य जैव-चिन्ह (बायोमार्कर) माना जाता है।  

सामान्य जैव-द्रवों के अलावा, जैव-चिन्हों (बायोमार्करों) का पता लगाने के लिए आजकल मस्तिष्कमेरु द्रव या सी.एस.एफ. का भी परीक्षण किया जा रहा है। मस्तिष्कमेरु (सी.एस.एफ.) एक पौष्टिक द्रव है जो हमारे मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के अंदर पाया जाता है। तपेदिक के कुछ मामलों में, मस्तिष्क के बाहरी आवरण (जिसे मेनिनजेस कहते हैं) में सूजन आ जाती है जिसका जल्दी पता ना लगाया तो हालत घातक बन सकती है। इस अवस्था को दिमागी बुखार या मैनिंजाइटिस कहते हैं। एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित जैव-चिन्ह (बायोमार्कर) की खोज से पता चला है किस बीमारी की अवस्था में मस्तिष्कमेरु द्रव (सी.एस.एफ.) में एक विशेष प्रकार के रासायनिक प्रदार्थ पाये जाते हैं जिसे सायक्लोप्रोपेन (तीन कार्बन द्वारा निर्मित एक त्रिकोणीय संरचना) कहते हैं। इसी तरह एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित मेटाबोलोमिक्स से तंत्रिका तंत्र को प्रभावित अन्य बीमारियों लिए भी जैव-चिन्हों (बायोमार्करों) की खोज हुई है। इनमे अल्जाइमर रोग, हंटिंग्टन रोग, जीवाणु संबंधी (बैक्टीरियल) और विषाणु संबंधी (वायरल) मैनिंजाइटिस शामिल हैं। वर्तमान में प्रयोग हो रहे ज्ञात दवाओं में ८९% छोटे अणु हैं। इसी कारणवश जैव-चिन्ह (बायोमार्कर) की खोज का चिकित्सीय क्षमता बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान है। ये जैव-चिन्ह (बायोमार्कर) आज के कई अपराजेय रोगों की विरुद्ध अचूक हथियार सिद्ध होने की क्षमता रखते हैं। खोज किये गए जैव-चिन्हों (बायोमार्करों) में से एक छोटा सा प्रतिशत भी अगर नैदानिक परीक्षण को सफलता पूर्वक पास कर लेता है और दवाओं के रूप में बाजार में आ जाता है तो ये चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि होगी।
पिछले कुछ दशकों में एन.एम.आर. स्पेक्ट्रोस्कोपी और अन्य तकनीकों ने कोशिका के अंदर और बाहर बड़े अणुओं के व्यवहार के विषय में विशिष्ट जानकारी प्रदान की है। एक कोशिका के विभिन्न हिस्सों और अणुओं के बीच चल रहे रोचक एवं लयबद्ध सामन्जस्य और संतुलन की जानकारी हमें इन तकनीकों के कारण ही प्राप्त होती है। बुनियादी विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे तेजी से विकास के कारण कोशिकाओं के हर घटक और अणुओं की भूमिका की एक साफ तस्वीर हमे दिखती है। यह ज्ञान नए दौर के दवाइयों के खोज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है जिससे बीमारियों का मुकाबला एक बेहद लक्षित तरीके से किया जा सकता है। चाहे वो चमत्कारी दवाएँ हों, या निदान किट हो, या फिर टीके या उपचारों की बात हो, अब हमारे पास वे दुर्जेय शस्त्रागार है जो विगत दशकों में नहीं थे। इसी कारण अब हम अपने लिए और अधिक सुरक्षित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।

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